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Monday, February 24, 2025

अन्यथा, सब मिथ्या है

_______*अन्यथा, सब मिथ्या है*____


जब ऑंसू

मेरी आँख में 

आए 

और तुम 

मेरे अश्रुओं को

गिरने से 

पहले ही 

रोक दो

तो रिश्ता सच्चा है 

अन्यथा 

सब मिथ्या है।

जब तुम्हें ज़रूरत ना हो 

मेरे शब्दों की

मेरे बोले बिना ही 

तुम मुझे 

सही

समझ जाओ तो 

रिश्ता सच्चा है 

अन्यथा, सब मिथ्या है।

रिश्ता चाहे 

ख़ून का हो

चाहे हो सगा 

या हो रिश्ता 

सिर्फ़ प्रेम का

जब हम साथ हँसे 

और साथ में रोये 

तो ही

रिश्ता सच्चा है 

अन्यथा, सब मिथ्या है।

जब एक पुकार पे ही

तुम

आ जाओ 

तो रिश्ता सच्चा है

अन्यथा, सब मिथ्या है।

जब तुम्हें 

मेरा आना

महज एक औपचारिकता 

निभाना ही ना लगे

तो रिश्ता सच्चा है 

अन्यथा, सब मिथ्या है।

 - मधुकान्ता श्रृंगी


Monday, October 23, 2023

ना हो निर्दोषों का नर-संहार

            ना हो निर्दोषों का नर - संहार 

इज़रायल पर हमास के रॉकेटों से हमले और निर्दोष इज़रायली नागरिकों के अपहरण और हत्याओं की जितनी निंदा की जाए, कम है।

लेकिन अब इज़रायल भी जो हमले कर रहा है उसमें भी निर्दोष नागरिकों की ही जानें जा रही है। 

सबसे अधिक दुःख की बात है कि दोनों ही देशों की महिलाओं और बच्चों को भी बख्शा नहीं जा रहा है। हमला-पीड़ितों मुख्य रूप से मासूम बच्चों और महिलाओं के हृदय विदारक फोटो देख कर शायद ही कोई व्यक्त्ति होगा जिसका मन वेदना से न भरा हो। 

इसका जिम्मेदार कौन है - इस विषय पर एक अंतहीन बहस भी जारी है।

लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदार वो है जिसने अभी शुरुआत करी। 

आतंकवाद से किसी का भी भला नहीं हो सकता है। लेकिन आतंकवाद के दुष्परिणाम सदैव भयानक ही होते हैं।

क्या आतंकवादियों को मालूम नहीं था कि वो जो हमले एवं हत्याएँ करने जा रहे हैं, उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी ?

जब आतंकवादियों ने हमले के लिए महीनों तक एक गुप्त योजना बनाई,तो क्या उस हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप होने वाले आक्रमण से खुद को सुरक्षित रखने के लिए कोई प्लान नहीं बनाया होगा। अवश्य बनाया होगा पर सिर्फ़ और सिर्फ़ स्वयं को सुरक्षित रखने हेतु।

जिन लोगों के नाम पर वो ये सब विध्वंस कर रहे थे उन बेचारों को तो वे बेसहारा छोड़ गए। 

यदि वो वास्तव में उनके हितैषी होते तो ऐसे शान्ति भंग करने की पहल कभी नहीं करते क्योंकि उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि उनके हमले के जवाब में भी हमले ही होंगे।

आतंकवादी भी इंसान ही होते हैं उनके सीने में भी दिल ही होता है जो किसी भी निर्दोष व्यक्ति की जान नहीं लेना चाहता। परन्तु उनका ब्रेन वाश करके उन्हें गुमराह किया जाता है।

अभी भी सैकड़ों नए आतंकवादियों को भड़काया जा रहा होगा।अभी हुए हमलों से भी भयंकर हमलों के बीज बोए जा रहे होंगे।

काश हम इस आतंकवादी मानसिकता को ही जन्म लेने से रोक पाये।

श्रीकृष्ण ने कहा था शान्ति किसी भी कीमत पर मिले तो भी सस्ती है।

कितनी भी अभेद्य सुरक्षा की व्यवस्था कर लीजिए उसे भी कोई ना कोई भेद ही देगा।

नित नई तकनीक और हथियारों का दुरुपयोग रोकने में असमर्थ हम - अपनी मानव जाति को ही नहीं अपितु सभी प्राणियों एवं पर्यावरण को एक ऐसे खतरे की और धकेल रहे हैं जिसकी भरपाई कभी भी नहीं हो पाएगी।

जिस युद्ध विभीषिका से बचने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ UNO की स्थापना की गई थी उसकी भी कोई सुन नहीं रहा है।

लगता है कि अब पूरी दुनिया के सभी शांतिप्रिय इंसानों को ही आतंकवाद और युद्ध के विरोध में एकजुट होकर मुखर होना होगा, अपनी आवाज आतंकवाद के हर रूप के खिलाफ सशक्त तरीके से बुलन्द करनी होगी - हर देश में, हर धर्म में।

वरना जो रूस - यूक्रेन में हुआ, जो इज़रायल - गाज़ा पट्टी में हो रहा है वो किसी दिन आपके यहां भी हो सकता है।

- मधुकांता श्रृंगी,
कोटा - राजस्थान

Tuesday, August 15, 2023

77वें स्वतंत्रता-दिवस-पर्व - 15 अगस्त 2023 पर

इस स्वतंत्रता दिवस पर सबसे ज्यादा बधाई का अधिकार हमारे उन लोगों का है, जिन्होंने भारत को आज़ादी मिलने के बाद जन्म लिया था | 

हमारे ये देशवासी जितना ज्यादा बुरा से बुरा सोच सकते हैं भारत में ग़ुलामी का काल उससे भी कई गुना ज्यादा बुरा था | 

इतना बुरा था कि उसके बारे में लिखना या किसी भी माध्यम से दिखाना,सुनाना असम्भव है |

यदि सम्भव हो भी जाये तो भी हमारी संस्कृति हमें मर्यादा लाँघने की अनुमति नहीं देती है | 

अतः आप लोग जिन परिस्थितियों को कठिन समझते हो वो तो बिल्कुल भी कठिन नहीं है | कठिनाइयों भरा जीवन तो हमारे बुजुर्गों, पूर्वजों ने देखा था जिन्होंने अपना सुख,सारी सुविधाएँ,अपना परिवार तक त्याग दिया था | अपना सब कुछ बलिदान कर दिया था,अपने जीवन तक की भी आहुति दे दी थी- शहीद हो गए थे कि उनके देश की भावी पीढ़ियाँ - स्वतन्त्र भारत में ससम्मान जीवन जी सके | 

हमारे लाखों-करोड़ों देशवासी शहीद हुए परन्तु आप लोगों को उनमें से केवल कुछ लोगों के बारे में ही जानकारी है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि बाकी शहीदों का त्याग व्यर्थ गया | 

बिल्कुल भी नहीं अपितु हम उन असंख्य,अज्ञात शहीदों के और ज्यादा आभारी हैं जिनके नामों का कहीं कोई उल्लेख नहीं है |

इतने बड़े राष्ट्र की आज़ादी केवल चंद  लोगों के प्रयासों से सम्भव नहीं थी | और भारत ने तो दशकों तक नहीं,  शताब्दियों तक दासत्व का विषैला दंश झेला था |

पहले मुगलों की ग़ुलामी का, फिर अंग्रेजों की ग़ुलामी का |

परंतु फिर भी हमारे लिए बहुत गर्व की बात है कि हमारे पूर्वजों ने हर हाल में हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति को जीवित रखा | 

अन्यथा आप स्वयं सोचिये कि इतनी शताब्दियों की दासता, इतने दबावों,  इतने असहनीय-अमानवीय अत्याचारों के बावजूद हमने हमारा धर्म नहीं छोड़ा, हमारे त्यौहार,  हमारी पूजा, हमारे भगवान नहीं छोड़े |

यहाँ तक कि हमारे मन्दिरों को तोड़ दिया गया था लेकिन हमने अपने हृदयों में - हमारे भगवानों को बसाये रखा - जब तक कि उन्हें पुनः उनके मूल स्वरूप में उन्हीं मन्दिरों में पुनर्स्थापित न कर दे |

यहाँ पर यह उल्लेख करना भी अत्यन्त आवश्यक है कि इतनी लम्बी दासता की अवधि में भी, हमने किसी भी अन्य धर्म को कोई नुकसान, कोई क्षति नहीं पहुंचाई | 

परन्तु हमारे इसी सर्व -धर्म समभाव को हमारी कमज़ोरी समझा गया | यही नहीं हमें आपस में लड़ाने-भिड़ाने की साज़िशें की गयी और आज तक करी जा रहीं हैं |

स्वतंत्र भारत में जन्मी नयी पीढ़ी से अधिक बधाई के पात्र हैं हमारे आदरणीय वो बुजुर्ग भारतीय जिन्होंने पराधीन भारत में जन्म तो लिया परन्तु सोच जिनकी हमेशा स्वाधीनता और स्वावलंबन की रही |

बधाई, बहुत बहुत बधाई हमारी तीनों  सेनाओं - हमारी थल सेना,हमारी वायुसेना और हमारी नौसेना - के  वीर सैनिकों को जो अपने अदम्य साहस के साथ बिना थके,निरंतर हमारे देश की रक्षा करते हैं और हमारी आजादी के लिए सहर्ष- अपने प्राण भी न्यौछावर करने में कभी पीछे नहीं रहते हैं |

आप लोगों में कितने ही व्यक्तियों ने अपने किसी रिश्तेदार के ऑपरेशन के लिए चिकित्सा कर्मचारियों द्वारा दिए गए अनुमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए होंगे |

सत्य बताना - "क्या उस समय आपके हाथ काँपने लगे थे ?"

आप में से अधिकतर का उत्तर "हाँ " ही होगा |

एक अनुमति पत्र पर हस्ताक्षर करने में सामान्य लोगों की हिम्मत साथ नहीं देती, वो अनुमति जिसमें स्वस्थ होने की संभावना अधिक होती है और मरने की कम |

तो कभी कल्पना की है कि उन लोगों का, उनके परिवार वालों का क्या हाल होता होगा जिनके यहाँ से वीर हमारी सेनाओं में भर्ती होते हैं, शहीद होते हैं ?




Wednesday, June 7, 2023

शायद फिर इस जनम में मुलाकात हो ना हो

   "शायद फिर इस जनम में मुलाकात हो ना हो "

कभी कहीं पढ़ा था, "जब भी किसी से मिलो तो ऐसे मिलो जैसे आखिरी बार मिल रहे हो ।"

किसने लिखा था, ये तो याद नहीं।

हाँ, अच्छा लगा तो इसे अपनाने की कोशिश भी करी और फिर कुछ दिन में भूल गए।

लेकिन कभी इस सीख को भूलना इतना दुःख दे सकता है ये तो सोचा ही नहीं था।

वैसे भी आजकल दुनिया मतलबी हो गई है आप किसी से निस्वार्थ प्रेम से मिलते हो तो वह लोगों के गले नहीं उतरता। शायद यह भी एक कारण है अपनापन कम होने का।

वर्षों बाद आप अपने किसी मित्र से मिलो तो आप क्या करोगे ?

और दशकों बाद किसी मित्र से मिलो तो ?

घंटों बात करोगे या दो - चार दिन तक भी ।

पर यदि मुलाकात किसी शादी में हो तो ?

उत्सव के माहौल और भीड़ में - आप अपनी पुरानी स्मृतियों को ठीक से याद भी नहीं कर पाते हो - और मुलाकात खत्म हो जाती है  पुनः शीघ्र मिलने की आशा के साथ।

परन्तु जब अचानक से आपको मालूम पड़ता है कि वो मित्र अब कभी नहीं मिलेगा क्योंकि वो तो अपनी जीवन संगिनी के साथ देवलोक गमन कर गए तो ऐसा अघात लगता है जो आपको पूरी जिंदगी कचोटता रहता है कि काश आप कुछ देर और उनसे बात कर लेते।

बबलू हम भाभी से तो पहली बार ही मिले थे और कितने अपनेपन व स्नेह से मिली थी वो।

चेहरे और नाम मैं अक्सर भूल जाया करती हूं और अपनी इस आदत से परेशान भी बहुत हूं। लेकिन अब भाभी का चेहरा भुलाए नहीं भूलता जबकि सिर्फ़ एक बार ही उन्हें देखा था ।

हमें तब पता नहीं था कि कोरोना नाम की एक भयानक महामारी आने वाली है जो अपनी चपेट में असंख्य निर्दोष इंसानों को लेकर सदा के लिए शांत कर देगी ।

बबलू और भाभी ही अकेले नहीं हैं,और भी रिश्तेदार-मित्र-परिचित इस दुनिया से विदा हो गए ।

अभी भी कोरोना के कारण खोखले हुए शरीरों को ढोते हुए लोगों को ज्ञात ही नहीं होता कि वो कब दिवंगत हो जायेंगे ।

कल ही फिर एक बार पुन: ऐसा ही हुआ। कुछ महीने पहले ही कोई बहुत ही अच्छे से मिल कर गया और कल जब मालूम पड़ा कि वो तो राम नवमी के दिन ही बैठे - बैठे ही गुजर गए तो विश्वास नहीं हुआ।

इससे पूर्व भी एक महिला रिश्तेदार की सीढ़ियों पर बैठ कर अपने बेटे से मोबाइल पर बात करते करते ही निधन का समाचार मिलने पर हम ही नहीं सब अचंभित थे।

अब तो लगने लगा है कि, "जब भी किसी से मिलो तो ऐसे मिलो जैसे आखिरी बार मिल रहे हो।"
यही जिंदगी का सबसे बड़ा और शाश्वत सत्य है।

अगर आप किसी की बड़ी मदद या सहायता ना भी कर पाओ तो भी, जब भी मिलो तो किसी से भी, मानवता के नाते ही प्रेम - स्नेह से मिलना।

सुर-साम्राज्ञी,स्वर-कोकिला  स्वर्गीय लता मंगेशकर जी ने दशकों पहले ही इन शब्दों को अमर कर दिया था अपने गायन से, 

"शायद 
फिर इस जनम में 
मुलाकात हो ना हो ...."

"लग जा गले" - मुन्ना भाई एमबीबीएस  में संजय दत्त ने भी बिना किसी मतलब के, बिना किसी स्वार्थ के दी गई जादू की झप्पी के महत्व को बहुत ही खूबसूरती से समझाया था ।

हो सके तो अब आप भी जिस किसी से मिले तो भले ही गले ना मिले। पर इस तरह तो मिल ही सकते हैं कि यदि आपको भी उनके आकस्मिक निधन का दुखद समाचार मिले तो आपको भी मेरी तरह ये पछतावा ना हो कि काश हम उस दिन उससे थोड़ा और स्नेह से बात कर लेते, थोड़ी ज्यादा देर बात कर लेते।

16 हजार से भी ज्यादा हार्ट सर्जरी करने वाले कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर गौरव गांधी जी के असामयिक दुखद निधन का समाचार पढ़ा, तो लगा सिर्फ 41साल के युवा और फिट डॉक्टर के साथ ऐसा हो सकता है तो फिर सामान्य व्यक्ति को तो और भी सतर्क रहना चाहिए।


ये लेख चाह कर भी प्रकाशन हेतु प्रेषित नहीं कर पा रही थी लेकिन जयपुर - भूकम्प से पुनः एक बार जीवन की क्षण-भंगुरता का अहसास हुआ।जब अपने और अपने करीबियों की जीवन रक्षा के लिए पूरा शहर ही अपने घरों से बाहर सड़कों पर आ गया था। तो लगा अब और विलंब करना उचित नहीं होगा।अत: इसे मैं अपने इस ब्लॉग पर पोस्ट कर रही हूं।

जयपुर भूकम्प एक ईश्वरीय संकेत है। इसका छपना आवश्यक है कि बाद में पछतावा करने से बेहतर है कि हम जब भी किसी से मिले तो ऐसे मिले - 

"शायद 

फिर इस जनम में 

मुलाकात हो ना हो।"

तो फिर अब कोशिश करिए कि जिससे भी मिले ऐसे ही मिले कि जैसे वो अंतिम मुलाकात हो।

-मधुकांता श्रृंगी
कोटा


Wednesday, May 3, 2023

बहते चलो

ज़ब ये लगने लगे कि कोई रास्ता नहीं बाकी

मेरी मुसीबतें कम होती ही नहीं

कोई मुझे समझता ही नहीं

किसी को मेरी ज़रूरत नहीं

अब कोई मेरी मदद नहीं

कर सकता

क्यों मैं अपने को

और मेरे अपनों को

ज्यादा दुःख दूँ

क्या फ़र्क पड़ता है

किसी को

मेरे होने या

ना होने से

तो बच्चे

ये समझ लेना

कि मृत्यु

हो गयी तुम्हारी

पर आत्महत्या Suicide मत करना

उस निराशा भरी जिंदगी की

समाप्ति करके

अब एक नयी शुरुआत करना

ना, मैं वही घिसी-पिटी लाइन्स

नहीं रिपीट कर रही

बल्कि एक नया रास्ता

दिखाने की कोशिश है

नयी शुरुआत से मतलब है

अब ज़िन्दगी को उस तरह

मत जियो , जैसे अब तक

जीते थे

अब बहते चलो

नदी में

तिनके की तरह

जहाँ वो ले जाये

तुम्हें तिनका सम्बोधित  करने का

आशय तुम्हारी इज्जत में कमी करना , हरगिज नहीं

अपितु तुम्हें तिनके जैसा हल्का , महसूस करवाना है

जब ज़िन्दगी, अपनी ज़िंदगी ही

तुम ना ज़ी सको , अपनी इच्छा से

या अपने प्रियजनों की

मन-मर्जी के अनुरूप भी

तो चुनो उस मार्ग को

जिसका निर्माण भगवान ने

तुम्हारे लिए ही किया

क्योंकि व्यर्थ ही तो

कोई कुछ बनाता नहीं

फिर भगवान ने भी तो

तुम्हें यूँ ही

तो रचा नहीं

बहते चलो

जहाँ तुम्हें

तुम्हारी नदिया

ले जाये

उड़ चलो

जहाँ तुम्हें

हवा ले जाये

इतनी बड़े ब्रह्माण्ड में

अपना अस्तित्व

तिनके से भी तो

छोटा ही है

एक बार

तिनका  बन कर तो देखो

बहते चलो

एक बार बह कर तो देखो

क्योंकि तिनका कभी

डूबता नहीं 

क्योंकि तिनका कभी

डूबता नहीं ।

- मधुकांता श्रृंगी

Monday, December 19, 2016

Save a life

        हर एक friend ज़रूरी होता है

अगर आप एक ज़िन्दगी बचाते हो , तो
आप एक डॉक्टर से भी
बड़े हो

आप एक बच्चे को
बचाते हो, तो
आप एक माँ से भी
बड़े हो

अगर आप खुद को बचाते हो, तो
आप ख़ुदा से भी
बड़े हो