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Wednesday, June 7, 2023

शायद फिर इस जनम में मुलाकात हो ना हो

   "शायद फिर इस जनम में मुलाकात हो ना हो "

कभी कहीं पढ़ा था, "जब भी किसी से मिलो तो ऐसे मिलो जैसे आखिरी बार मिल रहे हो ।"

किसने लिखा था, ये तो याद नहीं।

हाँ, अच्छा लगा तो इसे अपनाने की कोशिश भी करी और फिर कुछ दिन में भूल गए।

लेकिन कभी इस सीख को भूलना इतना दुःख दे सकता है ये तो सोचा ही नहीं था।

वैसे भी आजकल दुनिया मतलबी हो गई है आप किसी से निस्वार्थ प्रेम से मिलते हो तो वह लोगों के गले नहीं उतरता। शायद यह भी एक कारण है अपनापन कम होने का।

वर्षों बाद आप अपने किसी मित्र से मिलो तो आप क्या करोगे ?

और दशकों बाद किसी मित्र से मिलो तो ?

घंटों बात करोगे या दो - चार दिन तक भी ।

पर यदि मुलाकात किसी शादी में हो तो ?

उत्सव के माहौल और भीड़ में - आप अपनी पुरानी स्मृतियों को ठीक से याद भी नहीं कर पाते हो - और मुलाकात खत्म हो जाती है  पुनः शीघ्र मिलने की आशा के साथ।

परन्तु जब अचानक से आपको मालूम पड़ता है कि वो मित्र अब कभी नहीं मिलेगा क्योंकि वो तो अपनी जीवन संगिनी के साथ देवलोक गमन कर गए तो ऐसा अघात लगता है जो आपको पूरी जिंदगी कचोटता रहता है कि काश आप कुछ देर और उनसे बात कर लेते।

बबलू हम भाभी से तो पहली बार ही मिले थे और कितने अपनेपन व स्नेह से मिली थी वो।

चेहरे और नाम मैं अक्सर भूल जाया करती हूं और अपनी इस आदत से परेशान भी बहुत हूं। लेकिन अब भाभी का चेहरा भुलाए नहीं भूलता जबकि सिर्फ़ एक बार ही उन्हें देखा था ।

हमें तब पता नहीं था कि कोरोना नाम की एक भयानक महामारी आने वाली है जो अपनी चपेट में असंख्य निर्दोष इंसानों को लेकर सदा के लिए शांत कर देगी ।

बबलू और भाभी ही अकेले नहीं हैं,और भी रिश्तेदार-मित्र-परिचित इस दुनिया से विदा हो गए ।

अभी भी कोरोना के कारण खोखले हुए शरीरों को ढोते हुए लोगों को ज्ञात ही नहीं होता कि वो कब दिवंगत हो जायेंगे ।

कल ही फिर एक बार पुन: ऐसा ही हुआ। कुछ महीने पहले ही कोई बहुत ही अच्छे से मिल कर गया और कल जब मालूम पड़ा कि वो तो राम नवमी के दिन ही बैठे - बैठे ही गुजर गए तो विश्वास नहीं हुआ।

इससे पूर्व भी एक महिला रिश्तेदार की सीढ़ियों पर बैठ कर अपने बेटे से मोबाइल पर बात करते करते ही निधन का समाचार मिलने पर हम ही नहीं सब अचंभित थे।

अब तो लगने लगा है कि, "जब भी किसी से मिलो तो ऐसे मिलो जैसे आखिरी बार मिल रहे हो।"
यही जिंदगी का सबसे बड़ा और शाश्वत सत्य है।

अगर आप किसी की बड़ी मदद या सहायता ना भी कर पाओ तो भी, जब भी मिलो तो किसी से भी, मानवता के नाते ही प्रेम - स्नेह से मिलना।

सुर-साम्राज्ञी,स्वर-कोकिला  स्वर्गीय लता मंगेशकर जी ने दशकों पहले ही इन शब्दों को अमर कर दिया था अपने गायन से, 

"शायद 
फिर इस जनम में 
मुलाकात हो ना हो ...."

"लग जा गले" - मुन्ना भाई एमबीबीएस  में संजय दत्त ने भी बिना किसी मतलब के, बिना किसी स्वार्थ के दी गई जादू की झप्पी के महत्व को बहुत ही खूबसूरती से समझाया था ।

हो सके तो अब आप भी जिस किसी से मिले तो भले ही गले ना मिले। पर इस तरह तो मिल ही सकते हैं कि यदि आपको भी उनके आकस्मिक निधन का दुखद समाचार मिले तो आपको भी मेरी तरह ये पछतावा ना हो कि काश हम उस दिन उससे थोड़ा और स्नेह से बात कर लेते, थोड़ी ज्यादा देर बात कर लेते।

16 हजार से भी ज्यादा हार्ट सर्जरी करने वाले कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर गौरव गांधी जी के असामयिक दुखद निधन का समाचार पढ़ा, तो लगा सिर्फ 41साल के युवा और फिट डॉक्टर के साथ ऐसा हो सकता है तो फिर सामान्य व्यक्ति को तो और भी सतर्क रहना चाहिए।


ये लेख चाह कर भी प्रकाशन हेतु प्रेषित नहीं कर पा रही थी लेकिन जयपुर - भूकम्प से पुनः एक बार जीवन की क्षण-भंगुरता का अहसास हुआ।जब अपने और अपने करीबियों की जीवन रक्षा के लिए पूरा शहर ही अपने घरों से बाहर सड़कों पर आ गया था। तो लगा अब और विलंब करना उचित नहीं होगा।अत: इसे मैं अपने इस ब्लॉग पर पोस्ट कर रही हूं।

जयपुर भूकम्प एक ईश्वरीय संकेत है। इसका छपना आवश्यक है कि बाद में पछतावा करने से बेहतर है कि हम जब भी किसी से मिले तो ऐसे मिले - 

"शायद 

फिर इस जनम में 

मुलाकात हो ना हो।"

तो फिर अब कोशिश करिए कि जिससे भी मिले ऐसे ही मिले कि जैसे वो अंतिम मुलाकात हो।

-मधुकांता श्रृंगी
कोटा